सिंदूरी रेखा
सिंदूरी रेखा
माँग लाल सिंदूरी आभा से सजती है
एक कोमलाङ्गी तब वामाँगी बनती है ।।
उन्मुक्त गगन में उड़ती एक कन्या
जीवनपथ पर दायित्व समझती है ।।
अल्हड़पन को करती अलविदा
स्वयं में उत्तरदायित्व जगाती हैं ।।
माँ के आँचल से निकल ललना
अपनी एक पहचान बनाती है ।।
बेटी, बहना से इतर जीवन के नाते
भाभी, बहुरानी का संबोधन पाती है ।।
साजन के दिल की धड़कन वो बनती
जीवन बगिया में रिश्तों के पुष्प खिलाती है ।।
सिंदूरी की लाली रूप-सौंदर्य बढ़ाती
हृदय में प्रेम का अहसास जगाती है ।।
सजनी के माँग में सजती सिंदूरी रेखा
प्रियतम की लक्ष्मण रेखा बन जाती है ।।
जुड़ गयी एक नव कुल से सुकन्या
उसके ही हाथों में कुल की धाती है ।।
संस्कारों से कुल को सिंचित है करना
माँग की सिंदूरी रेखा ये समझाती है ।।
