शुकराना...
शुकराना...
और रखे भी तो तुम्हें यकीन कैसे होगा,
तुम तो बैठे हो कोसों दूर,
मन मारकर, दिल मजबूर!
तो ज़िंदगी होती कितनी आसान,
सब हासिल आसानी से हो,
फिर ज़िंदगी की क्या होगी पहचान?
पत्ता-पत्ता जोड़, अपना आशियाना सजाया था,
फिर एक झोंका हवा का आया,
सब तहस-नहस कर चला गया!
ढूँढते खुद को खुद की निगाहों में!
खलता फिर से खालीपन,
सब साथ हैं,
फिर भी भटकता यह मन!
कुछ सपने, कुछ उम्मीदें भी!
कुछ टूटे, कुछ बिखरे,
कुछ हमको बदल गई!
रब का शुकराना करते हैं,
कि अपनों से दूर ही सही, तूने जिंदगी तो दी,
जो मिला है मुझे जिंदगी में अब,
वह मेरे सपनों से भी बेहतर है सब!
