शीर्षक: माचिस की तीली
शीर्षक: माचिस की तीली
शीर्षक: माचिस की तीली एक छोटी सी डिब्बी में, सौ अरमान सोए हैं, नन्हीं-नन्हीं लकड़ियों में, कई तूफान सोए हैं। कीमत इसकी चंद पैसे, पर काम बड़ा कर जाती है, एक रगड़ से सोई हुई, ज्वाला को जगाती है। डिब्बी कहती तीली से— "संभल कर तू बाहर आना", बिना लक्ष्य के कभी भी, अपना वजूद मत जलाना। शक्ति तो है तेरे भीतर, पर संयम भी ज़रूरी है, बिना रगड़ के आग यहाँ, सदा रहती अधूरी है। ये तीली हमें सिखाती है, कि शांत रहना बेहतर है, पर वक़्त पड़े तो दुनिया को, अपनी ताकत दिखाना बेहतर है। खुद जलकर जो औरों का, चूल्हा और चिराग जलाए, वही छोटी सी तीली, असल में महान कहलाए। एक छोटी सी सीख (कहानी का सार): माचिस की तीली का स्वभाव इंसान जैसा होना चाहिए। जैसे तीली अपनी शक्ति को डिब्बी के अंदर सुरक्षित रखती है और केवल ज़रुरत पड़ने पर ही जलती है, वैसे ही इंसान को अपनी ऊर्जा और क्रोध को फालतू बातों में नहीं जलाना चाहिए। जब सही मौका (लक्ष्य) आए, तभी अपनी प्रतिभा की आग जलानी चाहिए।
