मखमली सावन
मखमली सावन
आसमां से सांवली घटाएं उतरती हैं, तो हवाएं भी झुककर उन्हें सलाम करती हैं। ये महज़ बादल नहीं, ये तो समंदर का सब्र है, जो बरसने को बेताब, ज़मीं की हर कब्र है। फिर वन के उस सन्नाटे में एक शोर जागता है, नीली गर्दन वाला वो परिंदा, मिट्टी की महक की ओर भागता है। वो पंख नहीं खोलता, वो तो कुदरत का परचम लहराता है, जब गिरती है पहली बूंद, वो अपनी हस्ती मिटाता है। शायरी: बादलों की महफिल में आज अजीब सी हलचल है, शायद मोर के इंतज़ार का ये आखिरी पल है। जब थिरकते हैं वो पैर तो ज़मीं भी झूम उठती है, लगता है कि बरसों की प्यास का यही इकलौता हल है। वो मखमली पंख, जिनमें हज़ारों कायनातें बंद हैं, उसके नाच के आगे तो फरिश्ते भी रजामंद हैं। हर एक ठुमके में जैसे कोई पुराना राज़ खुलता है, बारिश के पानी में जब उसका वजूद धुलता है। वो पंख पसार कर जब अंबर की ओर देखता है, खुदा भी अपनी रहमतों को ज़मीं पर फेंकता है। ये मोर का नाच नहीं, ये तो कुदरत की बंदगी है, इन बूंदों के शोर में ही तो छिपी असली ज़िंदगी है। शायरी: बिन कहे जो कह दे, वो बादल की ज़ुबानी है, और मोर का ये रक्स, सदियों पुरानी कहानी है। पंखों के हर रंग में छुपा है एक गहरा दरिया, ये बारिश तो बस उसे पाने का एक ज़रिया है।
