STORYMIRROR

Abhilasha Chauhan

Abstract

4  

Abhilasha Chauhan

Abstract

शब्द संपदा-दोहावली

शब्द संपदा-दोहावली

1 min
22.8K

वक्त

वक्त-वक्त की बात है, सबके बदले ढंग।

वक्त पड़े ही बदलते, खरबूजे के रंग।


कविता

कविता कवि की कल्पना, जन-मन की है आस।

समय भले ही हो बुरा, कविता रहती खास।


भाव

भाव बिना जीवन नहीं, नीरस होते प्राण।

ढोते बोझा व्यर्थ का, कैसे हो परित्राण।


प्रेम

प्रेम समर्पण माँगता, जैसे चातक चाह।

स्वाति बूँद की आस में, कितनी भरता आह।


मानव

मानव तब मानव बने, करे जगत कल्याण।

मानवता के धर्म पर, वारे अपने प्राण।


शीतलता

शीतलता तन-मन बसे, सुखद लगे संसार।

माटी घट में नीर ज्यों, बनता जीवन सार।


लीला

लीलाधर लीला करें, तीनों लोक निहाल।

गोपी बनकर घूमते, कैसा मचा धमाल।


हुलिया

भोले बाबा चल पड़े, जा पहुँचे ससुराल।

उनका हुलिया देखकर, सभी हुए बेहाल।


माँ

लाल कभी बिलखे नहीं, रखती माता ध्यान।

संतति का उत्कर्ष हो, करती विष का पान।


माँ की बाँहें स्वर्ग हैं, सुख का हैं भंडार।

कष्ट कभी छूता नहीं, यम भी माने हार।


वीर

वीर कभी थकते नहीं, भरते हैं हुंकार।

कैसा भी रणक्षेत्र हो, नहीं मानते हार।


वीरता

बिना वीरता के क्षमा, नहीं शोभती मित्र।

डटकर करना सामना, परिस्थिति हो विचित्र।


अनुराग

सुरभित मंद पवन बही, छलक उठा अनुराग।

आया भँवरा झूम के, कलियाँ खिलती बाग।


शाश्वत

धरती अंबर का मिलन, सुंदर शाश्वत सत्य।

प्रेम चराचर जगत का, कारण बनता नित्य।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract