शैतान मन
शैतान मन
सखि, ये मन शैतान बड़ा है
चंचल पवन के जैसे ये मन
निर्मुक्त सा गगन में उड़ा है
सखि, ये मन शैतान बड़ा है
इक पल भी कहीं ठहर न पाये
इसको कहीं भी ना चैन ही आये
भाग के सजना के पास ही जाये
जुल्मी मुझे हाय बड़ा तरसाये
नैन लगे जब से तब से बिगड़ा है
सखि, ये मन शैतान बड़ा है ।
इसके पीछे मैं डोलूं दिन भर
कभी चौबारे तो कभी छत पर
याद सताए उनकी रह रह कर
कैसे जियूं इतने दुख सह कर
कैसे जुलमी से पाला पड़ा है
सखि, ये मन शैतान बड़ा है ।
श्री हरि

