सच से सामना...!
सच से सामना...!
आज सच से जब सामना हुआ,
बदहवास घबराया हुआ
वो कितना बदरंग
कितना कुरूप सा दिखा,
हारा, परेशान सा
अपने में खोया दुबका मिला।
मैंने पूछा...!
सच तुम क्यों परेशान से दिखते हो?
झूठ के लबादों से घबराए
गुमसुम सहमे रहते हो।
सच सकपकाया....!
थोड़ा सकुचाया.....!
फिर दबी जुबां से बोला,
आज कल सच कौन बोलता है,
दूसरों की खामी ढूंढते ढूंढते
हर कोई अपनी खुदी को
परतों में लपेटता है,
गैरों के दामन में दाग देखते हैं
गिरेबान में अपनी
असलियत छिपाते हैं,
इधर उधर की बड़ी बातें कर
हकीकत से दूर
खुद भागते हैं,
सच अब कहां
सच रह गया है,
यहां तो झूठ भी अब
सच सा हो गया है,
लिबास सच का पहन
झूठ सच को दबाती है,
झूठ को सच्चाई में लपेट
सच का ही गला दबाती है,
छल, कपट और बेईमानी
यही तो हथियार हैं इसके,
घोर कलजुग है भाई
यही तो पहरेदार है इसके...!
हर तरफ झूठ बिखरा पड़ा है,
वो चालों पे चाले चलता है,
और मैं....?
झूठ के आगे बेबस, कमजोर
लाचार खड़ा हूं,
उसके तीरों से
असहाय घायल पड़ा हूं,
आंखों में उसके मैं
वर्षों से खटक रहा हूं,
आज वो तीव्र तो मैं
मंद पड़ा हूं,
इस सच झूठ की लड़ाई में
अब मैं हार गया हूं,
हक की लड़ाई लड़ते लड़ते
झूठ से मात खा गया हूं,
कभी जिद की थी मैंने भी
झूठ को हराने की,
हर किसी के दिल में सच बसाने की,
पर आज अपनों से ही
पराजित हूं,
इस कलजुग में
अंतिम सांसें गिन रहा हूं..!
मैं अब अंतिम सांसें गिन रहा हूं...!
