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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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सच नहीं है — सच में

सच नहीं है — सच में

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कभी-कभी लगता है,

सच लिखने से अच्छा है—ना लिखें,

सच्ची बात कहने से बेहतर—ना कहें।


कहीं सच ज़हर ना बन जाए,

ज़हरीले लोगों के लिए।

कहीं ये तलवार ना बन जाए,

मासूमों के लहू से भीगी हुई कटार के लिए।


कोई सच निचोड़ ना ले वो खून,

जो बरसों औरों का लहू पीकर बना है।

सच उन्हें कंगाल ना कर दे,

जिनकी दौलत गरीबों से है लूटी हुई।


सच वो आग कहता है,

जो लहलहाती फसलों को जला देती है,

पर इतिहास की किताबों में राख होती है।


उन्हें डर है कि कहीं ये सच,

उनके महलों की नींव ना दिखा दे,

जो झूठ की ईंटों से खड़ी है।

उन्हें खौफ़ है कि सच वो आवाज़ ना बन जाए,

जिसके होंठों पर सदियों से सिक्के चिपके हैं।


मुझे भी भय है,

कहीं सच तोड़ ना दे सदियों पुरानी परिपाटी।

और सच लिखने के जुर्म में,

पड़े मुझे हजार लाठियाँ।


पर सच तो यही है—

कि सच कभी कुछ नहीं बदलता।

जितना भी चीखो,

झूठ से आगे नहीं बढ़ता।


सच कभी वो आईना नहीं बनता,

जो चेहरों का असली रंग दिखा दे,

डर है कहीं वो खुद ही टूटकर बिखर ना जाए।


लिखा हुआ सच,

बस काग़ज़ों में रह जाता है,

इक दिन स्याही संग,

नाली में बह जाता है।


पर फिर भी...


एक चिड़िया इस सन्नाटे को चीरकर मुझसे कहती है—

"सच वो पंख है, जो टूटे भी,

तो उड़ान की याद दिला जाता है।

सच वो दीपक है, जो बुझे भी,

तो धुआँ बन सवाल उठा जाता है!"


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