सौंदर्य-पूजन
सौंदर्य-पूजन
मदिरा से परिपूर्ण अधर,
कोमल और पूर्ण, अधर,
या रह गए अपूर्ण अधर,
छू के करें सम्पूर्ण अधर!
आसव टपकाते ये नयन,
मन को तड़पाते ये नयन,
यूँही आस जगाते ये नयन,
मृगतृष्णा उठाते ये नयन!
उत्तुंग वक्ष, कमनीय कटि,
ये लिए समक्ष रमणी खड़ी!
कि क्या दूँ उसे उपमा नई,
उसकी कोई है उपमा नहीं!
तो यहीं शब्दों को विराम दूँ,
अपने कलम को विश्राम दूँ!
ऐसी रमणी की, ये कल्पना,
है कवि की ये अनु-कल्पना!
पाठक, इसे प्रेयसी जान ले,
इस स्वप्न को अपना मान ले!
रचियेता फिर से कुछ रचेगा,
पुनः, अपने मन की कहेगा!
फिर स्वप्नसुंदरी को उकेरेगा,
पाठक को, लालियत करेगा!
इस तरह सौंदर्य-पूजन होगा,
यूँ नए काव्य का सृजन होगा!
