साहस
साहस
धरती पर चलती चीटी ,
साहस कैसा रखती है।
लघु जीवन है उसका,
पर पथ से नहीं भटकती है।
कोई ऐसा छोर नहीं है,
जिस ओर है उसकी डोर नहीं।
कण-कण उसका अपना है,
वही तो उसका सपना है।
जब दाना लेकर चलती है,
तब गिरती और सँँभलती है।
लाखों दुश्मन है इसके,
पर तनिक न उससेे डरती है।
करती है जीवन यापन,
घोर श्रम से अपना।
अनुुुपम है प्रकृृति की,
काले तम सी रचना।
