रमाई.
रमाई.
कुदरत ने बख्शा था जीवन साथी प्रतिभावान,
सोचा था आगे जीवन होंगा सुखी व आसान.
माता –पिता के मृत्यु के बाद मुंबई में शरण,
मुंबई में ही मामा ने किया रमाई का कन्यादान.
चाहे तो बाबासाहेब दे सकते थे यकीनन,
रामू को राणीयों जैसा आलीशान जीवन.
पति के दलित समाजकार्य को करना था गतिमान,
रमाईने दि थी उसे अग्रता,प्रोत्साहन और सम्मान.
पति के विदेशी शिक्षा का किया मनसे समर्थन,
पति के अनुपस्थिति मेँ मिला दुखदाई जीवन.
करना था पति के समाज सेवा का दिल से समर्थन,
अपने भावनाओं की दी थी आहुंती व किया समर्पण.
स्त्री की उसकी संताने होती हैं उसका असली धन,
जीवित रहते हुएँ देखा था अपने लाडलों का मरण.
संतान शौलाकुल ने माता रमाई को किया उदासीन,
लेकिन बाबा के सपनों के लिए किया सर्वस्व बलिदान.
अच्छे जीवन के लिए कर सकती थी वह निवेदन,
रोखकर बाबा का दलित समाज सुधार अभियान.
लेकिन वह थी भारतीय सभ्य नारी शक्तिमान,
पति की स्वप्नपूर्ती थी एकमात्र उसका अरमान.
केवल सैंतीस साल मैं ही माता रमाई का निधान,
बाबा के सिरपर गिरा था मुसीबतों का आसमान.
बिना रमाई के अधूरा था बाबा लक्ष्य व जीवन,
क्यों की वह थी ढिठ भारतीय महिला असामान्य.
रमाई मातोश्री थी कई खूबियों का अनमोल मिश्रण,
उसमें थे त्याग,सहायोग,सहिष्णुता व समाधान के गुण.
दलित –पिछड़े समाज के लिए वह थी आशा की किरण,
काश,उसे भी नसीब होता बाबा लिखित भारतीय संविधान!.
