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Minal Aggarwal

Abstract

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Minal Aggarwal

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रेशम के धागे से बुन रही ख्वाब पर

रेशम के धागे से बुन रही ख्वाब पर

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रेशम के धागे से 

बुन रही ख्वाब पर 

यह रेशम का जाल नहीं 

जिसमें रेशम का कोई कीड़ा रहता हो या 

इसके फूल से गुलाबी लबों पर 

कोई सुनहरी सूरज सी चमकती 

तितली बैठती हो या 

यह एक सुंदर पोशाक बनाकर 

पहनने योग्य हो 

यह तो एक सूती कोरा कपड़ा है 


वह भी कटा फटा 

एक कागज का टुकड़ा है 

बिना कहानी का 

तोड़ा मरोड़ा हुआ 

एक खददर का झाड़न है 

जालीदार 

पारदर्शी 

जिसके आरपार सब दिखता है 

साफ साफ 

चेहरे के भाव भी 

तन के घाव भी और 

मन के राग भी 

कितने रंग मिले होते हैं 

इस आसमान में पर 

यह दिखता आसमानी सा ही है 


इंद्रधनुष मिलकर बनता है सात रंगों से पर 

यह सफेद रंगों का ही 

कोई कुदरती करिश्मा होता है 

मन के पिटारे में 

जाने क्या क्या भरा है 

सुख और दुख 

एक दूसरे से जुदा नहीं 

न जाने कितना कुछ है 


एक दूसरे के विरोधाभास में 

जीता हुआ पर 

सब कुछ मिला हुआ है 

इन्हें विभाजित करना 

असंभव सा प्रतीत होता है 

मेरी आंखें जो सपने देखना 

चाहती है 

वह हकीकत में मुझे 

मिलते हैं कहां पर 


मैं इस कारण कहीं हारती नहीं 

सपने देखता नहीं छोड़ती 

ख्वाब बुनना कहां छोड़ा है मैंने 

पलकों की चिलमन से 

निकलती किसी उम्मीद की 

शाख पर बैठकर 

ख्वाब मेरे हों रंगीन न सही 

रेशमी धागों से बुने हुए न 

सही 

एक टूटे हुए कांच से 


चटके लटके हों तो फिर 

क्या हुआ 

यह पूरे हों 

अधूरे हों 

तो क्या हुआ 

हैं तो यह मेरे ही ख्वाब 

ना।


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