रावण असत्य का
रावण असत्य का
जब हृदय बसे हों मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम,
फिर बुराई रूपी रावण का दहन ही हो अंजाम,
प्रभु के पथ पर रहें अग्रसर पथ प्रकाशित हो,
अंधकार से दूर रहें हम आचरण मर्यादित हो,
द्वेष द्वन्द कभी छू भी ना पाये तेज सूर्यादित हो,
असत्य की भाषा ना बोलें सत्य आच्छादित हो ,
कर्मों का करें अवलोकन किसी को ना आहत करें
परोपकार की भावना पनपे मजबूरी ना बाधित करें
धू धू कर जलता है रावण कहता इच्छाओं का अंत नहीं,
स्वयं में ढूंढ बुराई मुझे जलाना कोई हल ही नहीं ,
लौटता हूं मैं हर साल क्यों क़भी पूछा है स्वयं से,
प्रतीक हूं बुराई का लौटूंगा जब तक रहेगी इस जग में,
प्रति वर्ष बढ़ा देते हो मेरा कद स्वयं पर कर अभिमान,
बुराई का कद क्यों बढ़ रहा पूछो स्वयं से मानव महान,
मुझे जलाने से कुछ ना होगा करो कभी मनन चिंतन,
भीतर बैठा जो रावण है खत्म करो पहले वो आचरण,
स्वयं पथ प्रज्जवलित होगा सत्य का ओढ़ोगे आवरण
असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है विजयादशमी,
बुराई का अंत करो ना रह जाये उसमें तनिक भी कमी,
भीतर के रावण का अंत करो तब प्रसन्न होंगे प्रभु राम,
प्रकाश की ओर अग्रसर लगेगा अन्धकार पर पूर्णविराम,
तब कहीं जाकर मिटेगा बुराई रूपी रावण धरा से,
दहन करते हैं प्रति वर्ष किंतु सीखते नहीं कुछ इस प्रथा से,.
विजयादशमी देती यह सीख कद बड़ा हो कितना असत्य का,
सत्य की इक छोटी चिंगारी भस्म कर देती है रावण असत्य का..!!
