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Ajay Singla

Abstract

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Ajay Singla

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रामायण१४:राज्याभिषेक की तैयारी

रामायण१४:राज्याभिषेक की तैयारी

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जब से राम व्याह कर आए

मंगल शगुनहुए खुश हैं सारे

प्रजा मन में ये सोचे है कि

राम बनें युवराज हमारे।


राम के जैसा बेटा पाकर

रही न राजा की कोई हसरत

तीनों भुवनों और तीनों काल में

सबसे बड़भागी हैं दशरथ।


एक दिन दर्पण देखें दशरथ

सफ़ेद बाल देख, आया

मन मेंयुवराज पद अब राम को दे दूँ

छोड़ के सब मैं जाऊं वन में।


बुलाकर बोले मुनि वशिष्ठ को

अभिलाषा मेरे है मन में

जीते जी राज्य राम को दे दूँ

ख्याति राम की है जन जन में।


मुनि प्रसन्न कहें करो तैयारी

मंत्रिओं को था बुलाया

प्रस्ताव रखा, सहमत थे सब वो

 सब ने हाँ में सिर हिलाया।


रामचंद्र के राज तिलक की

अयोध्या में शुरू हुई तैयारी

ढोल नगाड़े पूजा और

यज्ञमंडप लगे थे भारी भारी।


राम और सीता को उस दिन

हो रहे बड़े शुभ शगुन

सोचे लौट आए हैं दोनों

मामा के घर गए भरत शत्रुघ्न।


राजतिलक की खबर जो आई

रनिवास में हर्षित हैं सब

दशरथ राम के पास मुनि को

शिक्षा देने भेजें हैं तब।


सीता सहित प्रणाम किया उन्हें

राजतिलक है, मुनि बताएं

दशरथ के पास जब गए राम जी

वो बैठे आँखें बिछाए।


विनती करें कुछ देवता

माँ सरस्वती हमको बचाएं

हमारा कार्य सिद्ध हो तभी

त्यागें राज्य राम, वन में जाएँ।


मंदबुद्धि दासी थी मंथरा

बुद्धि फेरी सरस्वती ने

पता चला कल राजतिलक है

भागी कैकई के भवन में।


आंसू देख के कैकई पूछें

ऐसा मुँह है क्यों बनाया

बोली षड्यंत्र किया कौशल्या ने

तुम को ये समझ न आया।


राजा ने भी की चतुराई

भरत भेज दिए मामा के घर

राम को करने चलें तिलक हैं

तुम ठोकर खाओगी दर दर।


कैकई ने डांटा मंथरा को

कहा राम की मुझसे बहुत प्रीती है

छोटा सेवक, बड़ा भाई स्वामी

रघुकुल वंश की ये ही रीति है।


तुम्हारे भले के लिए कहा है

त्रिया चरित्र मंथरा फिर बोली

सुनाई सोतों की कहानियां

मन में कपट, बनती थी भोली।


बार बार सुनके ये बातें

कैकई की भी बुद्धि फिर गई

लगने लगी हितै षी मंथरा

आशंकाओं से वो थीं घिर गयीं।


मंथरा ने फिर ये बोला कि

युवराज भरत को मैं बनवाऊं

राजा तो तेरे वश में हैं ही

उपाय इसका मैं तुझे बताऊँ।


तुम्हारे दो वरदान पुराने

राजा के हैं पास मांग लो

भरत के लिए तुम राजतिलक और

राम के लिए वनवास मांग लो।


कैकई गयीं कोपभवन में

राजा दशरथ वहां थे आए

सुनकर,गुस्से में है कैकई

सहम गए, कुछ समझ न पाए।


कैकई से पूछा दशरथ ने

क्या दर्द है तुम्हे सताता

जो मांगोगी वही मिलेगा

सौगंध राम की मैं हूँ खाता।


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