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Dr Jogender Singh(jogi)

Abstract

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Dr Jogender Singh(jogi)

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राजदार

राजदार

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बतलाना चाहती कोई बात,

कुछ छिपाना चाहती।

लकीर काजल की रोकती,

लक्ष्मण रेखा सी।

राज़, आसमान के तारों से

अधिक छुपाती।


छलक जाते कभी कभार ,

बन कर पानी।

सफाई से, सलीके से,

पोंछना सर झुका कर।

राज़ को राज़ रखने की,

प्यारी सी कोशिश।

बेनकाब होने नहीं देगी।

यकीं है, प्यारी आंखों पर।



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