STORYMIRROR

Dipti Agarwal

Abstract

4  

Dipti Agarwal

Abstract

प्यास

प्यास

1 min
328

मुद्दतों बात आज मौका मिला उस 

डूबते सूरज से गुफ्तगू करने का, 

आस पास सब हो कर भी 

एक अजब ख़ामोशी थी, 


शाम के उस सुर्ख मंज़र में,

गूंजता वह कल कल करता पानी का शोर, 

और चेहरे को रूक रुक के,

सहलाते ठंडी हवा के थपेड़े, 


मैं समुन्दर के बीचों बीच थी और, 

और ! वह ठीक मेरे सामने था, 

सारा दिन जल के गरम कोयले सा

 लाल हो चुका था,

 

समुन्दर का ठंडा दामन, 

बाहें फैलाये इंतज़ार कर रहा था उसका, 

और वह भी डूब कर उसमें,

 घुल जाना चाहता था ।


अपनी थकान अपनी 

प्यास बुझाना चाहता था, 

कितना जलता और?

हद हो चुकी थी,

कितना झुलसाता और ?

पोह फूटते से झुलस रहा है,


अब बस कुछ देर और फिर,

उसकी प्यास बुझेगी, 

रंग जायेगा पूरा समुन्दर उसके रंग में, 

यह बेबाक सोच मेरी,

क्या सच मेरे दोस्त आफताब, तुम्हारे लिए है?


या खुद को तुम्हारी जगह,

रख के सोच रही हूँ, 

कुछ  अनकहे अधूरे ख्वाबों में,

झुलस रही हूँ कब से,

कहाँ है वह मेरा समुन्दर ?

बहुत थकान हो गयी है,  

बढ़ी प्यास लगी है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract