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vidhi joshi

Romance


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vidhi joshi

Romance


प्यास

प्यास

1 min 222 1 min 222

तू एक शहर जैसा था

मैं तो बहती उसमें एक नदी

तू लोगों को समा लेता अपने अंदर

मैं तो ढूंढने चली थी एक समंदर

तू इस बस्ती में भी किसी अपने को ढूंढने चला

मैं भी आयी थी उस घाव पर लगा ने दवा


जब किनारे पे देखा तूझे पहली बार

लगा के अब हो चुकी थी मेरी हार

तेरे शहर में क़दम रखा था अब

ना जाने क्यूँ लगा सब संभाल लेगा रब

तेरा शहर कुछ अपना सा लगने लगा था

जो भी था एक सपने सा लगने लगा था

पर था तो तू एक सपना ही


जिसे कभी तो होना था पूरा भी 

काश ठहर जाता दो पल और साथ 

तो कर लेती जी भर कर तुझ से बात

जान कर भी तू जान ना पाया 

एक नदी की ये प्यास बुझा ना पाया 

जो मुझ में था वही ढूंढने चली थी

उस तितली की तरह में भी मनचली थी

जो कोई ना सीखा सका वो तू सीखा गया

ख़ुद से प्यार कैसे करते है वो तू बता गया


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