प्यार है , समझौता नहीं
प्यार है , समझौता नहीं
हां मैं कुछ भावों में बहकर,
कभी कभी रो जाती हूँ,
कभी कभी कुछ प्यार भाव में,
रिश्तों में खो जाती हूँ।
कभी कभी तुमसे मेरी ,
कुछ उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं,
और कभी सब राहें मेरी,
तुम तक ही मुड़ जाती हैं।
पर तुम मेरे प्रेम भाव को,
मेरी कमज़ोरी मत समझो,
मैं तुम बिन ना जी पाऊंगी,
ऐसी मज़बूरी मत समझो।
हां मैंने ये जीवन मेरा,
साथ तुम्हारे जीना चाहा,
साथ तुम्हारे हर सुख दुःख में,
हंसना, जीना रहना चाहा।
मैंने चाहा साथ साथ में,
उत्तुंग शिखर को छू लेंगे,
एक दूजे के साथ में,
हम जीवन हंसकर जी लेंगे
पर ये प्यार मेरी आँखों से,
आंसू बनकर बहता है,
जिसे समझती थी प्यार वो,
बंधन जैसा लगता है।
मैं निश्छल मन से सरल रूप में,
प्यार तुम्हें कर सकती हूँ,
पर प्यार के नाम पे केवल,
स्वसम्मान नहीं तज सकती हूँ।
यह रिश्ता छोटा बड़ा नहीं है,
इसकी भी एक मर्यादा है,
ये समानता का एक सफ़र है,
ना काम कोई ना ज्यादा है।
प्यार प्यार के नाम पे केवल,
पाबंदी मंज़ूर नहीं है,
मैंने तुमसे प्यार किया है,
ये मेरा निर्णय है कुसूर नहीं है।
मैं सदा सच्चे दिल से,
इस रिश्ते को निभाऊंगी,
पर किसी भी गलत बात पर,
सर ना कभी झुकाउंगी।
प्यार को समझे बंधन दुनिया,
मैं वो कारण नहीं बनूँगी,
प्यार लगे कमज़ोरी जिसकी,
उदाहरण वो नहीं बनूँगी।
इसीलिए दृढ़ निश्चय कर,
मैं बंधन ये अब तोड़ रही हूँ,
प्यार तो अब भी करती हूँ,
पर साथ तुम्हारा छोड़ रही हूँ।
जिस रिश्ते में मर्यादा ना हो,
उसमें ना बंध पाऊंगी,
जहां प्यार में सौदा हो,
मैं वहां नहीं रह पाऊंगी।
मैं समझौता ना कर पाऊंगी।।
