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Shristee Singh

Abstract

4.0  

Shristee Singh

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पवन

पवन

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पवन ऐसी बहे मेरे द्वार,लेकर आये खुशियाँ आपार। 

पूर्व, पश्चिम, उत्तर या हो दक्षिण दिशा,लेकर आये सुनहरे दिन, भीनी निशा। 

जब चले चाल मस्तानी,झूमे सारे , छोड़ कर ग्लानि । 

आये जब गुर्राती वो,जागे जग मै, जो रहे हो सो। 

इठलाती, झूमती रहती घूमती,थल और गगन को चूमती। 

जहाँ मिले पुष्प, सुगन्धित करती संसार,झूमती सृष्टि सारी, संग तेरे बारम्बार। 

न दिखे कभी, पर दिलाती एहसास, भेद न करे किसी से,

जाती सबके पास  झंकृत करे जो ह्रदय के तार,पवन ऐसी बहे मेरे द्वार। 


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