पूजा सम प्यार
पूजा सम प्यार
ईश्वर है प्यार, पूजा समझ के कीजिए
फूल चढ़ाएं, लाली लगाएं, ऐसे ही कीजिए
श्रृंगार हर आराधना का होता है एक अंग
इक्कीसवीं सदी में नया हो सकता ही ढंग
अर्चना, पूजा, मधु, कुमकुम और अंजलि
स्त्रीलिंग शब्दों से सजी क्यों 'ओ' आली
इसलिए कि प्यार और पूजा होते हैं समान
इंसान जब प्यार करते तो बनते भगवान्
ध्यान के समान होती है प्यार में शक्ति
प्यार करना भी ऐसा होता जैसे कि भक्ति
सच्चे प्यार से मिल सकती बुराई से मुक्ति
विश्वास की बात है ये, नहीं कोई आसक्ति।
