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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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पुरुष अधूरा नारी बिन

पुरुष अधूरा नारी बिन

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हर क्षेत्र में नारी पुरुष के समान होती है

कौम और कुनबे की वो पहचान होती है


कभी सती सावित्री कभी दुर्गा सरस्वती

प्यार से समझो तो वह आसान होती है


करती हर वक्त काम करती नहीं आराम

अपने परिवार की वह तो जान होती है


मदद उसकी हमने भी करनी चाहिए

जब कभी थककर वो परेशान होती है


कभी सीता पांचाली कभी लक्ष्मी बाई

हर युग में पुरुष का वो मान होती है


नौ माह गर्भ में भ्रूण को रखती है वो

इसीलिए वह सदा इतनी महान होती है


मूरत वो होती है ममता व करुणा की

जन्म देकर शिशु का वो जहान होती है


पूरी तरह अधूरा पुरुष है उसके बिना

गृहस्थी के धनुष की वो कमान होती है


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