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Jaypoorna Vishwakarma

Abstract

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Jaypoorna Vishwakarma

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पत्र जो लिखा मगर भेजा नहीं

पत्र जो लिखा मगर भेजा नहीं

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 हे प्रभु

 रोज तेरे नाम

 लिखती रहीं अनेक पत्र

 मगर कभी भेज न सकी

 जिसमें भरी थी अनेक व्यथा 

 

मेरी दिन-प्रतिदिन की जीवन गाथा 

तेरे दर तक आकर 

जो-जो मेरा दिल पुकार पाया

तुझे आवाज दे-दे कर सुनाया 

मंदिर की घंटे घड़ियाल 


जब बजा-बजा कर हो गयी निढाल 

तूने अनुसनी की मेरी फरियाद 

तब मेरे मौन शब्दों को 

सुख-दुख के रहस्यों को 

करुणा-सी भरी उलझनों को 


मेरे दरिद्र गीतों को 

मेरे एकाकी आसुओं को 

मेरी झूठी मुस्कुराहटों को 

मेरे होठों की बंजर बातों को 

प्रेम से बुने कागज पर 

आस्था की कलम चलाकर 


लिखे तेरे लिए अनेक पत्र

कुछ निजी वेदना 

और इस संसार के हाल

जो तूने ही बनाई है रचना 

किन्तु मेरा हतभाग्य 


अंजान हूँ उस पते से 

कहाँ रहता है विधाता 

जो देकर भूल गया है जीवन

जो मुझे राह नहीं दिखाता

मेरे हाथ में है कोरा कागज


जिसमें से बोलती है जिज्ञासा

मैं निशब्द हूँ लेकिन

मैं जिसके नाम से हूँ 

वो मेरे हर शब्द से परिचित है

 वो मेरे हर अर्थ से परिचित है

 जो सब कुछ अलिखित है।  


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