पतझड़
पतझड़
पतझड़ आने से पहले
मैनें पीपल से पूछा
हरे लदे तेरे पत्तों में
इतना ताकत है कि
ठहर पाएंगे झर झर करके
अपने तालियां बजा
रोक जाएगा पतझड़ ?
पीपल ने कहा
ऐसी क्या हस्ती जो
इन पत्तों को गिरा जाए
ये खुद पीला हो वरण करते
छोड़ अपने शाखाओं का संग
ना वो नर्म ना वो धर्म
किसी पथिक समझे मर्म
ना वो छांह, ना वो पँछी आश्रय बांह
छोड़ तरु का युग धर्म निबाह
गिरकर भी उनमें
अन्तर कलह के खड़ खड़
हाय!यही है पतझड़ ,हाँ यही है पतझड़ ।
