पतित पावनी माँ गंगा
पतित पावनी माँ गंगा
निकल जुटाओ से शिव की,
जो धरती पावन करने आई,
क्यों करें उसी को मैला हम
कहते जिसको गंगा माई।
भागीरथ के है तप का फल,
यह पाप सभी के धोती है,
गोमुख से गंगा सागर तक
हरा भरा धरा को करती है।
है बूंद बूंद अमृत जैसी,
निर्मल, शीतल जल धारा है,
है खान गुणों की जल इसका
संपूर्ण विश्व ने माना है।
हो मानव या पशु पक्षी,
जंगल हो खेत या हो उपवन,
शीतलता इसके निर्मल जल की
देती है सबको नव जीवन।
यह पतित पावनी सुर सरिता,
सदियों से अविरल बहती है,
जो हार गया इस जीवन से,
यह उसे मोक्ष भी देती है।
प्रतिफल में देखो, हम मानव
निर्मलता इसकी छीन रहे,
सीवर, नाले, अपशिष्ट डाल,
हम ज़हर इसी में घोल रहे।
कदम कदम पर रोक इसे,
हम बाँध बनाये जाते हैं,
जो है जीवन धारा सबकी
बाधा उसको पहुंचाते हैं।
हैं बड़ भागी हम भारत वासी,
जो गंगा जल वरदान मिला,
आओ मिलकर अब प्रण हम लें
न होने देंगे इसको मैला।
