पंख और परवाज़
पंख और परवाज़
ख्वाहिशों के पर लगाकर
उड़ना तो हमें भी आता है
पर कोई मुझे ये बताए
इस तरह कोई कहां तक उड़ पाता है
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सोचने और करने में फर्क है बड़ा
हर मंजिल आसान लगने से क्या होता है
हर रास्तों पर कांटे होते हैं
मंसूबे बनाने से क्या होता है
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हुनर नहीं अगर कलाबाजियों का
तो पंख भी बेकार होता है
जुनून ना हो अगर उड़ने का
तो ये फितूर भी अवसाद होता है
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सीखना हो अगर जंग ज़िन्दगी का
चींटियों का फन काम आता है
खुद से ज्यादा बोझ लेकर
चल पड़ती है जहां मकाम आता है
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मंजिलें भी बाट जोहती हैं उन मुसाफिरों का
जिनके बाजुओं में ताकत का अंबार होता है
ज़िन्दगी जन्नत बनती है उसी की और
सपनों का घर उसी का आबाद होता है।
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