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Ratna Kaul Bhardwaj

Abstract

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Ratna Kaul Bhardwaj

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पिता बरगद की छाया

पिता बरगद की छाया

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याद आता है वह अपना आंगन 

वह अपना प्यारा छोटा सा घर 

जहाँ पले बड़े थे 

कुछ लाढ से , कुछ फटकार से 

कुछ तकरार से , कुछ प्यार से 


खुश नसीब थे हम कितने 

जब तक पिता का हाथ 

था हमारे सर पर  

खूब सजा रखा था परिवार 

दर्जा था उनका सबसे ऊपर 


बेफिक्र, बेपरवाह वह बचपन था

बेखौफ थी ज़िन्दगी 

था सुहाना वह सफर हमारा 

ममता की मूरत थी माँ जहाँ

पिता था एक अद्भुत सहारा 


छाया पिता की थी स्नेह भरी

परिवार के चेहरे पर 

बस्ती थी मुस्कान हमेशा 

हर हाल में हमें खुश देखना 

जीते थे बस यही इक सपना  


अपने अनुभव से हमें 

था खूब निडर बनाया 

दुनिया का रंग डंग हमें समझाया 

हर मुसीबत से लड़ना हमें सिखाया 

गर ज़िन्दगी थी धुप, थे वह बरगद की छाया 


एक दिन ऐसा तूफ़ान आया 

घर के दर दीवारों को 

उदासी का पैगाम दे आया 

मंज़र ऐसा बदल गया 

छा गया घर में सन्नाटा 


वह न रहे बस पालक झपते ही 

झटके में बदल गई ज़िन्दगी 

बिखर गए सारे सपने 

दुःख फैला हर कोने में 

वख्त ने डाला उलझनों में 


जिन्हें हर मुश्किल में हमने 

सबसे पहले खड़े हो देखा 

देखते ही उनकी मृत शया 

सपनों का गुलशन लगा 

बस खाक हो गया 


कुछ ऐसा मोड़ ज़िन्दगी में आया 

लगा सब कुछ बिखरा बिखरा 

फिर याद आई उनकी बातें 

उनकी दी हुई नसीहतें 

अब दूर भगानी थी मुश्किलें 


पूरे करने थे उनके सपने 

निपटाने थे काम, जो थे अधूरे

हिम्मत को फिर समेट लिया 

लाचारी को दफनाया 

उनके विश्वास का दमन थाम लिया 


आज जिस मोड़ पर खड़े हैँ हम 

है उनका यह आशीर्वाद  

उनके विश्वास से न पग डगमगाए 

असमंजस के पलों में 

आत्म विश्वास रखा बनाए 


पिता एक पेड़ है बरगद के 

परिवार रुपी गुलशन के 

जो हर दम अपना फ़र्ज़ हें निभाते 

पिता जिनके ज़िंदा है,कर्मयोगी है वे 

लम्बी उनकी आयु हो,प्रार्थना है ईश्वर से 



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