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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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फलक

फलक

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धुए में सब धुआं सा लगता है।धुआं हटे तो कुछ बात बने।

जमीन से फलक का सफर। जब तन्हा-सा लगा। तब मां का सिर पर हाथ दिखा।  

कह रही थी मानो,अकेला कहां है तू? रास्ते भी तो तेरे साथ हैं। अपनों के साए में ही तो, बढ़ रहे तेरे अरमान है।


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