फैसला तुम्हारा
फैसला तुम्हारा
तुमने पूछा भी नहीं, बस फैसला सुना दिया,
मैंने रोका भी नहीं, बस दिल को पत्थर बना लिया।
तुम बोली, “अब ये रिश्ता बस यादों तक ठीक है”,
मैं मुस्करा दिया बाहर से, भीतर खुद को तोड़ लिया।
आज भी फोन में सबसे ऊपर तेरा ही नाम दिखता है,
कॉल कोई और करे, दिल तुझसे ही बात करता है।
लोग पूछते हैं — “अब भी याद है वो?”
मैं हँस देता हूँ, और अकेले में खुद से हार जाता हूँ।
अब अगर जाना ही है… तो शान से जाना,
लाल लहंगे में खुद को चाँद जैसा सजाना।
तेरी चूड़ियों की आवाज़ जब गलियों से टकराए,
तेरी पायल की हर छन-छन मेरे सीने में उतर जाए।
हाँ… अपनी शादी का बुलावा ज़रूर भेजना,
मैं आऊँगा — टूट कर सही, मगर खड़ा रहूँगा।
एक कोने में चुपचाप सारी रस्में देखूँगा,
जैसे किसी और की नहीं… अपनी बिखरती किस्मत देखूँगा।
जब सात फेरे ले रही होगी, भीड़ ताली बजा रही होगी,
मैं दूर खड़ा बस तेरे चेहरे की भाषा पढ़ता रहूँगा।
कोई बोलेगा — “रो क्यों नहीं रहे तुम?”
मैं मुस्कुरा कर कहूँगा —
“जब मेरी जान खुश है… तो मेरा दर्द क्यों चीखे?”
तू जब पहली रात अनजानी दीवारों से घबराएगी,
अचानक से मेरा नाम तेरे मन में उतर आएगा।
एक पल को सोचेगी — “काश वो साथ होता…”
फिर खुद को समझाकर खामोशी ओढ़ ले जाएगी।
कुछ सालों बाद… जब अलमारी में वो पुराना डिब्बा मिलेगा,
हमारी धूल भरी तस्वीरें हाथों में काँप उठेंगी।
तू तस्वीर को कुछ लम्हे ज़्यादा देर थामे रहेगी,
और दिल बहुत धीमे से बोलेगा —
“वो लड़का बुरा नहीं था… बस मैं ही देर कर गई।”
और सुनो…
जब कभी रिश्ते बोझ लगने लगें,
जब दुनिया तुझसे मुँह मोड़ ले,
जब अपना पन कहीं खो जाए…
तो एक खामोश लड़का ज़रूर याद आना चाहिए,
जो तेरी बारात में भी बस तेरी खुशी के लिए मुस्कराया था।
तब तक के लिए… चाहे मेरी यादें मिटा देना,
मैं तो दुआओं में तेरा नाम लिख चुका हूँ।
जिस दिन तुम्हारी बारात में मुस्कराऊँगा मैं,
उस दिन हर दर्द को शायरी में जला दूँगा मैं।
ताकि दुनिया ताली बजाए…
और सिर्फ मेरा दिल जाने —
ये तालियाँ नहीं,
तेरे जाने की आवाज़ है…
जिसे मैं मुस्करा कर दबा रहा हूँ…

