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Kusum Lakhera

Inspirational

4  

Kusum Lakhera

Inspirational

पहाड़ी स्त्री

पहाड़ी स्त्री

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समतल मैदान सा समतल जीवन ...

नहीं होता.. पहाड़ी स्त्री का ...

वह रोज़ चढ़ जाती है ऊंची ऊंची ,.

पहाड़ियों पर ...

एक छोटी बकरी की तरह ,...

वह नाप लेती हैं ऊंचाइयां !!

पहाड़ की ! 

अक्सर पहाड़ भी इन स्त्रियों के सामने 

बौना हो जाता है !!

लकड़ी लाने जब जाती हैं.. जंगल में 

डर भी ...

इनके सामने रिरियाता है !!

इन्हें अंधेरे का ...

बाघ का ...

 प्रेत का...

अकेलेपन का ...

कोई भी डर ... नहीं सता पाता है !!

पहाड़ की स्त्री ..…

दर्द को भी धीरे धीरे ढोती हैं !!

वह दुःख और निराशा में रोती हैं !!

पर संघर्ष में भी आशा के बीज बोती हैं !!

घोर विपदा में भी नहीं घबराती हैं ...

अपने एकांत में पहाड़ को अपना साथी बनाती हैं !

कई बार लगता है जैसे पहाड़ संग बतियाती है !

अपने विरह को भूलने के लिए ...

वह अक्सर सुरीले प्यारे गीत गाती है !

अपने प्रिय के मंगल के लिए ...

वह मंगल गीत गाती है...

अपनी संतान के भविष्य के लिए ...

रोज देवी माँ को मनाती है ....

अपनी गागर में रोज मीठे झरने से 

अमृत सा पानी लाती है ...

अपने भार से कई भारी सामान ,

बेहिचक उठाती है ....

चाहे कितनी भी तकलीफ़ आएं,

वह उनसे लड़ती हैं ...

और जब उनके दुख को बांटने वाला

अपना पास नहीं होता ...

तब ये पहाड़ी स्त्रियाँ 

एक दूजे का सहारा बनती हैं !!

और ढांढस बंधाती है ....

सीढ़ीदार खेतों में ये बेख़ौफ़ 

हल भी चलाती हैं ,

अपनी भेड़ बकरी गाय को चराने 

के लिए एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ 

पर आसानी से चली जाती हैं !!

मिट्टी के चूल्हे में धीमी आंच में ,

साग बनाते हुए बहुत मासूम

बहुत खूबसूरत ...बहुत प्यारी

बहुत निःस्वार्थी सी नज़र आती हैं 

अक्सर पहाड़ भी कहता है कि ,

"हे सखी तुम हो तो पहाड़ भी हैं गुलज़ार 

तुम हो तो पहाड़ पर भी है बहार ...

तुम्हें बारम्बार हमारा नमस्कार "


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