पौराणिक कथा-ध्रुव तारा की
पौराणिक कथा-ध्रुव तारा की
आसमान में तारों का जगमगाना किसे नहीं अच्छा लगता,
पर एक तारा ऐसा वहांँ जो सबका ध्यान आकर्षित करता,
सदैव स्थिर रहता वो एक जगह सब तारों से जो चमकदार,
सबकी ज़ुबान पर है ज़िक्र जिसका वो ध्रुव तारा कहलाता।
पौराणिक कथा है ये बड़ी अनोखी कैसे बालक बना तारा,
सुनी सबने होगी ये कहानी आज थोड़ी याद कर लें ताज़ा
ब्रह्माजी के मानस पुत्र, स्वयंभू मनु के पुत्र ,जो उत्तानपाद,
उन्हीं के पुत्र थे ध्रुव, जिसने की, विष्णु की कठिन तपस्या।
राजा उत्तानपाद की, थी दो पत्नियांँ, सुरुचि और सुनीती,
सुरुचि से उत्तम और सुनीति से हुई पुत्र बालक की प्राप्ति,
बड़ी रानी सुनीति किन्तु झुकाव राजा का सुरुचि की ओर,
जो सुनीति और बालक ध्रुव दोनों से बड़ी ईर्ष्या थी करती।
खेल रहा था एक दिन बालक ध्रुव अपने पिता की गोद में,
तभी वहांँ आ पहुंँचती सुरुचि, देखने लगी ध्रुव को क्रोध में,
उतार ध्रुव को पिता की गोद से बैठाया अपने पुत्र को वहांँ,
बोली जो मेरे गर्भ से उत्पन्न, वहीं बैठगा, राजा की गोद में।
इसलिए इस सिंहासन पर बैठने का तेरा नहीं है अधिकार,
महज पाँच वर्ष का ध्रुव कैसे करता इन बातों का प्रतिकार,
किंतु समझ रहा था भली-भांति वो कि हो रहा है भेदभाव,
जाकर मांँ से ये बात कही बताया सौतेली मांँ का व्यवहार।
सुरुचि ने सारी व्यथा सुनाकर फिर पुत्र ध्रुव को समझाया,
ईश्वर भक्ति में छुपा सुख का मार्ग, बालक ध्रुव को बताया,
कहा गोद में ही बैठना है तो उस परमपिता के गोद में बैठो,
जो सर्वशक्तिमान है, जिसमें इस संपूर्ण सृष्टि को है बनाया।
बालक से तारा बनने की यहीं से शुरू होती जाती कहानी,
माता से ज्ञान प्राप्त हुआ, बालक ने भक्ति की शक्ति जानी,
निकल पड़ा ईश्वर भक्ति में, छोड़ माता-पिता और घर को,
मार्ग में समझाया देवर्षि नारद ने, पर ध्रुव ने हार ना मानी।
देवर्षि नारद ने जब देखा, ध्रुव कर चुका अब दृढ़ संकल्प,
और उन्हें समझाने का अब नहीं बचा है कोई भी विकल्प,
तो बालक ध्रुव को स्वयं देवर्षि नारद भक्ति का मंत्र देकर,
चले जाते हैं मिलने महल में राजा उत्तानपाद के पास तब।
पुत्र के यूंँ अचानक चले जाने से, दुखी था उनका संसार,
देख देवर्षी नारद को, आगे बढ़कर किया उनका सत्कार,
नारद बोले चिंता ना करो राजन, ईश्वर स्वयं उसके रक्षक,
आगे चलकर कीर्ति फैलाएगा यह बालक, देखेगा संसार।
राजा को हुआ संतोष, सुन कर नारद मुख से ऐसी वाणी,
उधर ध्रुव ने यमुना तट पर शुरू कर दी थी तपस्या करनी,
अपने दृढ़ संकल्प से बालक ने, हर संकट को पार किया,
तब का था तेज़ इतना कि तीनों लोगों में चर्चा होने लगी।
ध्रुव ने किया जो मंत्रोच्चारण, बैकुंठ धाम तक पहुंँच गया,
जागे योग निद्रा से भगवान विष्णु तप था प्रभाव कर गया,
देखा जब एक छोटा सा बालक कर रहा है कठिन तपस्या,
तब भगवान विष्णु ने आकर उस ध्रुव को शीघ्र दर्शन दिया।
कहा प्रसन्न मैं तुम्हारी भक्ति से, तुम्हें देना है विशेष वरदान,
समस्त इच्छाएंँ पूरी होंगी तुम्हारी, तुम बालक बहुत महान,
सप्त ऋषि नक्षत्रों के संग करते हैं जिस लोक की परिक्रमा,
जो प्रलय काल में भी सुरक्षित,ऐसा लोक कर रहा हूंँ प्रदान।
यह लोक तुम्हारे नाम का होगा, जो ध्रुव लोक कहलाएगा,
शासन करोगे पृथ्वी पे छत्तीस सहस्त्र वर्ष, ऐसा यश होगा,
तब ध्रुव ने नारायण की गोद में बैठने की, इच्छा की प्रकट,
स्वयं भगवान नारायण की गोद ऐसा नसीब किसका होगा।
श्री हरि ने तब बालक ध्रुव को, अपनी गोद में था बिठाया,
मरणोपरांत बालक को, ध्रुव तारा बनने का वरदान दिया,
छत्तीस हज़ार वर्षों तक, धर्म पूर्वक राज करने के उपरांत,
आकाश में ध्रुव तारा बन कर, सदा के लिए अमर हो गया।
