पास आओ कभी
पास आओ कभी
पास आओ कभी तो देखोगे तुम
छुपे हुए अश्क़ों में चेहरा अपना
जान पाओगे मजबूरियों का सबब
पाओगे मेरी हर ख़्वाहिश अधूरी
कभी मिले फुर्सत अपनी अना से
तो देख लेना करीब से दर्द-ए-दिल
कुछ अधूरे लफ्ज़ अधरों पे ठहरे
कुछ टूटे हुए ख़्वाब काँच से चुभते
पर शायद तुम्हें मंज़ूर नहीं मुझे देखना
क्योंकि मैं तो परतव हूँ धुँधली सी
जिसके साथ चलना भी तुम्हें लगता है
अपने बेशकीमती मयार के खिलाफ
तभी तो तुम नहीं आए मेरे करीब
या तुम काबिल नहीं रहे मेरे लिए
तुम क्यों नही आए हो मेरे पास
क्या किसी और का तुम्हारा नसीब।
