ओ सन्यासी
ओ सन्यासी
अरे, ओ सन्यासी
नेह के बंधन तोड़
किससे जुड़ने चले हो
क्या माँ तुम्हें याद नहीं आती
क्या बहिन का रक्षा सूत्र, भाई का स्नेह
मित्रों के वे हंसी ठहाके भूलकर
आँखों देखे सच भूल, किस से मिलने चले हो पत्नी का वो रूप निराला
प्रिय का प्रेम भरा उजाला
बच्चों का स्नेह, दुलार
छोड़ सब कर्तव्य, प्रेम
कंहा जवानी जलाने चले हो
पत्थर के पुतले बनकर
बुझाकर सारे संबंधो के दीप
मन, बुद्धि पर अंकुश लगाकर
रंग बिरंगे धागे सतरंगी
मन पर कुछ लिए बिना
कोरे कोरे कहां मुड़ने लगे हो
ये जवानी, ये दीवानगी, ये बंधन कच्चे धागों का
करनी धरनी के पंच तत्व बिन साज़ों का
कौन सा गीत गाने चले हो
क्या धर्म क्या मोक्ष क्या स्वर्ग
सब नेह नातों का करके बेड़ा गर्क
तुम कैसे मुक्त हो जाओगे
बिन माया मोह से गुजरे
काग़ज़ी अक्षर से कैसे निखरोगे
आत्मा, परमात्मा में उलझे
तुम क्यों सब व्यर्थ गंवाने चले हो.
