'नया खयाल '
'नया खयाल '
रोज एक नया खयाल आता है,
मन में अड़चनों का सवाल आता है।
कभी सुलझती हैं गुत्थियाँ बातों से,
कभी सन्नाटों में जवाब आता है।
ढूँढता हूँ किनारा इस शोर के बीच,
पर लहरों सा फिर एक उबाल आता है।
में थामना चाहता हु वक्त की कलाई,
पर हाथों में सिर्फ मलाल आता है।
