निर्भीक बने आक्रामक नहीं।
निर्भीक बने आक्रामक नहीं।
निर्भीक बने आक्रामक नहीं।
यज्ञ की पवित्र अग्नि बने जंगल की पावक नहीं।
रक्षक हो या संहारक शस्त्र दोनों उठाते है।
लेकिन संहारक के मारे जाने पर लोग खुशी से मुस्कुराते हैं।
निर्भीक रक्षक हो सकता है पर कभी संहारक नहीं।
धैर्य जो ना रख सके होगा तभी आक्रामक वही।
लक्ष्यहीन आक्रामक का लक्ष्य भी असफलता ही होगा।
निर्भीक धैर्यवान ही पाएगा सदा विजय श्री।
निर्भीकता सत्य की साथी है वह सत्य कथन से कभी नहीं घबराएगा।
झूठ उसके सामने यूं ही आक्रामक हो जाएगा।
निर्भीकता हारे या जीते पर उसमें है अवसाद और पश्चाताप नहीं।
आक्रामकता कितना ही भय फैला ले लेकिन
उसके साथ अंत में जुड़ना तो है अंधकार ने ही।.
