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Amit Kumar

Abstract

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Amit Kumar

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नहीं इस देश के लगते

नहीं इस देश के लगते

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यकीनन तुम नहीं औलाद, अपने देश की लगते,

भारत माँ की पीड़ा जो, तुम खुद नहीं समझे,

जहां रहते हो और खाते हो जिसकी माटी से भी तुम,

नहीं डरते ख़ुदा से तुम, नही इस देश के लगते।


लहू देकर जवानों ने, जिसकी माटी को सींचा,

दिया पैग़ाम भी हमको, वतनपरस्ती होती क्या,

नहीं मालूम है मुझको, तुम्हे क्या इल्म ग़द्दारों,

बस इक ये बात लगती है, नहीं तुम देश के लगते।


चंद सिक्कों की खातिर तुम, खुद को बेंच डाले हो,

बिना सच्चाई को समझे, ज़हर को दिल मे पाले हो।

समझ लो कि है होता क्या, मयस्सर में बुराई का,

लगाए आग जिसने भी, देखो खुद ही वो जलते।


तुम्हें लगता है कि ये राजशाही बाप की दौलत,

जो भी मर्जी में आएगा, वही तुम करते जाओगे,

फर्क पड़ता नहीं तुमको, सही हो या गलत कुछ भी,

कराते कत्ल हो हरदम, नहीं इस देश के लगते।


महारथ है तुम्हे गर तो, बुलंदी पाकर दिखलाओ,

नहीं भड़काओ शोलों को, न नफ़रत दिल मे फैलाओ,

तुम्हें लगता है कि बच जाओगे, नफरत के शोलों से,

गलतफहमी तुम्हारी है, नही तुम देश के लगते।


यकीनन हम हैं, वंशज उस अहिँसा के पुजारी के,

मग़र बंदर नहीं हैं उस, तमाशे के मदारी के।

संभल जाओ न भड़काओ, हमेशा देश में हिंसा,

ख़ाक कर देंगे हम तुमको, नहीं इस देश के लगते।


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