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Meenu Sardana

Tragedy

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Meenu Sardana

Tragedy

नारी मूर्ति नही इंसान है

नारी मूर्ति नही इंसान है

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अश्रु छलक रहे थे उसके, आज फिर डाँट पड़ी है पापा से,

काश ले आती नंबर ज्यादा, हो जाता गर्व से सिर ऊँचा पापा का।

यही सोचते -सोचते हो गया सवेरा।

आशा की एक किरण लाई नया सवेरा। 

समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ गया सयानी हुई शादी के बंधन मे बाँध दी गई , स

सुराल रूपी पिंजरे में कैद कर दी गई। 

ससुराल ही तेरा घर है ,पति परमेश्वर है बस यही सिखला दिया गया। 

अब यही है तेरा रखवाला बोल दिया गया | 

मान मर्यादा के साथ -साथ संस्कारों को बनाए रखना।

मुख में रखना जबान पर मुँह कभी न खोलना। 

हर पल उसकी आत्मा को खंडित करते गए।

सपनों के आसमाँ पर उसके पहरे लगाते गए।

पर वो हर जुल्मों- सितम ,हर परेशानी सहती गई।

घर की इज्जत बचाने की खातिर एक शब्द भी कह न सकी।

दो रोटी खाने की खातिर , बच्चो के उज्ज्वल भविष्य की खातिर अपना दर्द भी ब्याँ कर न सकी। 

माँ को जो बताती थी हर बात; वह राज छुपाती चली गई।

बदन पर दिए हर निशां को अपने आसुओ से मिटाती चली गई।

एक तिनका भी चुभ जाता था तो रो पड़ती थी, वो आज पूरा दिन शब्दों के घावों को सहती मुस्कुराती चली गई। 

प्रेम दायरे में रहकर किया जाए तो जीवन बदल देता है दायरे से बाहर आ जाए तो हिंसा में बदल जाता है।

 हे मानव ! क्यों अधर्म करते हो ? मानवता को मारकर क्यों बेगुनाह को जखमी करते हो ? 

कभी पारिवारिक विवशता के कारण ,तो कभी संकीर्ण मानसिकता के कारण

क्यों अमानवता की सीमा लांघ जाते हो ? वो भी एक बेटी है ,बहु है;

दिए की कोई बाती नही कि मन हुआ जला दिया नही मन तो बुझा दिया। 

मिट्टी का कोई खिलौना नही कि मन भरा तो तोड़ दिया।

हे मानव! अपनी झूठी शान में अभिमान में मत खेल उसकी अस्मत से, उसके स्वाभिमान से

हक नही है तुझे ईश्वर की अद्वितीया कृति बिगाड़ने का मासूम पर करके हिंसा एक दिन तू स्वयं तड़पेगा।

मत कर इतनी हिंसा कि तेरा स्वयं ही विनाश हो जाए। 

धरती माँ भी तेरा बोझ उठाने से इनकार कर दे| 


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