STORYMIRROR

Lipi Sahoo

Abstract

4  

Lipi Sahoo

Abstract

मुलाक़ात

मुलाक़ात

1 min
232

एक अरसा बीत गया

अपने आप से मुलाक़ात हुए


ना रात का अंधेरा था ना दिन का उजाला

फिर भी सुकून था लहराती हवावों में


मीलों तक थी लंबी तन्हाई

पर एक रवानी थी रूहानी धुन की


धुंधला सा था आसमान

कोहरे की चादर ओढ़े


आंचल में समेटे अनगिनत तारे

सुन रही थी उनकी धड़कन


फूलों का शहर था

भीनी-भीनी खुशबूओं में एक नशा था


साज़िश थी ओस के बून्दों की

चूम रहे थे बदन को


समेट रही थी इधर उधर बिखरे

खुशियों की सफेद मोतियां


ना कोई गिला था ना कोई शिकवा 

उस पूरे सफ़र में


ख्वाइशों की लम्बी कतार ना थी

सैकड़ों ज़िन्दगी जी ली उस लम्हों में


पता नहीं किसने रखा था अनोखा शीशा

ज़मीन से आसमान तक सिर्फ मैं हीं मैं थी !



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract