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Randhir Singh Dheeru

Abstract

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Randhir Singh Dheeru

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मुख पर कहना

मुख पर कहना

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मुख पर सीधा जो कहें,हित उसका वह जान।

दुश्मन उसको मानकर, करते लहूलुहान।


करते लहूलुहान, बने साया वे फिरते।

खुद गिरकर शैतान ,घाव उसको हैं देते।


कह धीरू कविराय, चोट करते हैं सुख पर।

जीना दूभर मान, कहें जो सीधा मुख पर।।


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