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V. Aaradhyaa

Romance Classics Fantasy

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V. Aaradhyaa

Romance Classics Fantasy

मस्तमलंग बसंत

मस्तमलंग बसंत

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बसंत ज़ब चंचल चपला बनकर आती है 

सबके मन में एक मस्तमलंग भाव जगाती है!


पीतांबरा बनकर धरती सज जाती है :

फूल कलियाँ बसंत के लय संग गाती है!


 बसंत की हरियाली जब छा जाती है :

आम की डारी भी महक महक जाती है!


मधुरम–मधुरम बयार ज़ब बहती है :

कोयलिया की बोली मन को लुभाती है!


शुक्लपक्ष की मांघी तिथि पंचमी आती है :

वसुंधरा मृदुल मृदुल मन खूब हर्षाती है !


 माँ शारदे भी इसी तिथि को पुनः आती है :

और अपने आशीर्वाद से ज्ञान बुद्धि बरसाती है।


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