मंजिल
मंजिल
मन कहता है
आसमां में चलो
दिमाग कहता है
चले आसमां में
तो गिर जाओगे
दिल और दिमाग ने
किया मिलकर मंथन और
कर दिया फैसला
जिंदगी की मेरी
संभल कर चलो
जमीन पर
पहुंच जाओगे मंजिल पर
न पालों ख्वाहिश
आसमां में उडने की
क्योंकि
जमीं तुम्हारी
आसमां परिंदो का
अपनी हद में रहो
उडने दो उन्हें भी
खुले आकाश में
फिर देखा है न
आसमां में उडने वाले को
उन्हें भी आना होता है
अपनी जमीं पर
इसलिए
मान लिया मैंने
फैसला दोनों का
आसमां को छोड
जमीन देख रहा हूं
जहां पर बना लूं
अपने ख्वावों का आशियां।
