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ritesh deo

Inspirational

4  

ritesh deo

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मन का खेल

मन का खेल

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दिल की गवाही देकर,मष्तिष्क में उतार,

मन की भावों को व्यक्त करते हम जाते हैं

बातें हैं मन की,उसे,दिल का, हम कहते हैं,

मष्तिष्क की बुनाई,कैसी ये भूलभुलैया है?


असंख्य भावों को संजोये रखता है मन,

भावुक हो कभी आँसू भी छलक जाते हैं

यादों को याद कर, मुस्करा भी लेते हैं हम,

ग़म भी भुलाने की कोशिश,करता है मन


दिल हर्षित क्षणों को उभार,खुशी दर्शाता है,

कहते हैं, दिल रोता है, अपने हालात पर भी

दिल में दर्द का आभास भी महसूस होता है,

दिल भी, कभी खुशी कभी ग़म, से जुझता हैं


दिल एवं मष्तिष्क अंग हैं,भौतिक काया के,

शु़्क्ष्म मष्तिष्क और ह्रदय का साथी है मन

मन हमेंशा बनाता रहता,महल भावनाओं का ,

वही मष्तिष्क और दिल का भाव दर्शक है।


दिल और मन को नचाता शुक्ष्म मष्तिष्क है,

सम्बन्ध है,शुक्ष्म मन और भौतिक दिल में

रिश्ता भी है,भौतिक शरीर और आत्मा का,

खेल तो बस मन का है,दिल तो परोक्ष रूप है.


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