ज़िन्दगी मझधार है !
ज़िन्दगी मझधार है !
ज़िन्दगी मझधार है,
हम फ़िर भी जीए जा रहे हैं।
महज़ तेरी याद से,
ग़म-दर्द सीए जा रहे हैं।
ज़िन्दगी मझधार है !
तुम्हें मुसर्रत हो मुबारक,
जफ़ा की सौगात में।
हम तो समंदर पीर का,
मयकदों में पीए जा रहे हैं।
ज़िन्दगी मझधार है !
अकसर अदा ही बेवफाई,
होती मुक़ाम-ए-इश्क़ पर।
फिर भी नग़मे प्यार के,
महफ़िलों में गाए जा रहे हैं।
ज़िन्दगी मझधार है !
चोट खाई है मुसलसल,
की जो तुमसे माशूकी ।
फिर क्यूँ मुकम्मल इश्क़ का,
राह चलते हर किसी को
इल्म दिए जा रहे हैं ?
ज़िन्दगी मझधार है !
तुम-सा कोई न हो सका,
तुम-सा कभी न हो कोई।
इस पार जो न हो मिलन,
उस पार मिलने की रज़ा
हर बार किए जा रहे हैं।
ज़िन्दगी मझधार है !

