STORYMIRROR

ashant shekhar

Abstract

4  

ashant shekhar

Abstract

मेरी शख़्सियत

मेरी शख़्सियत

1 min
409


खुद को पूरा करने की कोशिश अधूरी रह गयी

बहोत करीब पहुँचकर मंजिल की दूरी रह गयी


यहाँ बड़े ही अज़ीब तरीके है सच्चाई परखने के

झूठी दुनियां अपनी जुबाँ पे कहाँ खरी रह गयी


इस अंधी दौड़ के शर्त में हरेक शख्स शामिल है

और मेरी शख़्सियत इस भीड़ से घिरी रह गयी


यहाँ हर कोई आसमाँ को छूने के फ़िराक में है

पर ज़मी से फासले देख के आँखे डरी रह गयी


किस्मत के इंतेज़ार में बैठे थे वो थकहार गये हैं

मगर अपनी जिंदगी के साथ जंग जारी रह गयी


'अशांत' कही रक़ीब है पीछे छोड़ने की ज़िद में

मेरे हौसले के आगे ज़िद हारी की हारी रह गयी।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract