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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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मेरी डायरी

मेरी डायरी

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मेरी डायरी तो मेरा अन्तर्मन ही,तब थी 

जो बात कह बांट न सके किसी से थे

वो ही तो डायरी के पन्ने साझा करते हैं

खुशियों में तो सदा सभी साथ रहते हैं


कुछ भाव अन्तर्मन के ऐसे भी होते हैं

जो न किसी से भी साझा कर सकते हैं

बुरा न मान जाये वो अगर जान जाये 

इसी भाव, सहेजने में पन्ने लगे रहते हैं 


आज तो हर बात जासूस बन जाती है 

सुना बुजुर्गों से दीवालों के कान होते हैं

कभी-कभी डायरी ही दुश्मन बन जाती

बेनकाब मन के भावों को कर जाती है


मेरी पहली डायरी अन्तर्मन पर ही थी

सहेजी बातें लिख मन को खाली की थी

पहले डायरी लेखन का समय ही न था

संयुक्त परिवार में कोई टेंशन ही न था 


अब तो जिम्मेदारी से मुक्त फ्री रहती हूं 

प्रभु को भज अपने में ही खुश रहती हूं

पोते-पोती में फिर जी लेती स्व बचपन

उनके साथ साठ की, हो जाती पचपन। 

   



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