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बेज़ुबानशायर 143

Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

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मेरी चाहत

मेरी चाहत

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मेरी चाहत राणा जैसी, 

मैं रण करने जाऊँगा ।

दुश्मन की सारी सेना को, 

मुँह भर धूल चटाऊँगा ।


चाहे आगे कल खड़ा हो, 

कभी नहीं घबराऊंँगा ।

दो-दो हाथ करूँगा उससे, 

सीने पर चढ़ जाऊँगा ।


नहीं डरूँगा कभी किसी से, 

महाकाल बन जाऊँगा ।

पहले हमला नहीं करूँगा,

पग पीछ नहीं हटाऊँगा ।


मधु कैटभ वह अगर बनेगा, 

मैं दुर्गा बन जाऊँगा ।

पाक- चीन या कोई भी हो, 

कभी नहीं घबराऊँगा ।


किसका चरण सिंधु नित‌ धोता, 

सिर का ताज हिमालय है ।

हम उस जननी के बेटे हैं, 

आँगन जहाँ शिवालय है ।


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