मेरी चाहत
मेरी चाहत
मेरी चाहत राणा जैसी,
मैं रण करने जाऊँगा ।
दुश्मन की सारी सेना को,
मुँह भर धूल चटाऊँगा ।
चाहे आगे कल खड़ा हो,
कभी नहीं घबराऊंँगा ।
दो-दो हाथ करूँगा उससे,
सीने पर चढ़ जाऊँगा ।
नहीं डरूँगा कभी किसी से,
महाकाल बन जाऊँगा ।
पहले हमला नहीं करूँगा,
पग पीछ नहीं हटाऊँगा ।
मधु कैटभ वह अगर बनेगा,
मैं दुर्गा बन जाऊँगा ।
पाक- चीन या कोई भी हो,
कभी नहीं घबराऊँगा ।
किसका चरण सिंधु नित धोता,
सिर का ताज हिमालय है ।
हम उस जननी के बेटे हैं,
आँगन जहाँ शिवालय है ।
