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Jyotsna (Aashi) Gaur

Abstract

4.5  

Jyotsna (Aashi) Gaur

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मेरे भीतर का दशहरा

मेरे भीतर का दशहरा

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मैं ही सीता, मैं ही लक्ष्मण

मैं ही राम और मैं ही रावण ।

मैं ही कैकेयी, मैं ही दशरथ 

मैं ही हनुमान और मैं ही विभिषण ।

हर क्षण उलझता हूँ मैं वचनों में,

अपनी मृग्तृश्नाओं में, अपने किये हुए कर्मों में ।

महलों में भी प्रसन्न नहीं रहता कभी वनों में सन्तोष पाता हूँ ।

मेरे हर क्षण को इसी में रत सदा पाता हूँ ।

स्वयं से हारता और स्वयं ही को हराता हूँ ।

सद्गुणों रुपी राम को हृदय में धारण करता हूँ ।

भीतर तथा बाहर के दशानन का हर क्षण दहन भी करता और

स्वयं से ही शक्ति पाकर सभी असुरों से निरंतर लड़ता हूँ ।


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