STORYMIRROR

Karishma Gupta

Abstract

4  

Karishma Gupta

Abstract

मैं

मैं

1 min
178

जो नहीं थी कभी वो बन गई गई हूं मैं

इस कदर ना जाने किस से रंग में रंग गई हूं मैं


बस एक तेरे जाने से देख न कितना बदल गई हुं मैं

कहा़ तेरे सिवा सब व्यर्थ था पर कितना संभल गई हुं मैं


तू अब ज़रूरी नही तेरा अस्तित्व नहीं ये सच हैं 

खुश हूं मैं के तुझसे निकल गई ही मैं


बस एक एहसान करना की न हो अब दीदार तेरा 

क्योंकि तू अनजान है की कितना बदल गई हूं मैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract