STORYMIRROR

Akash Yadav

Abstract

4  

Akash Yadav

Abstract

मैं और मेरा मन

मैं और मेरा मन

1 min
248

आज जब मैं शांत हूँ 

मन मेरा मुझसे कहता है

क्यों तू इतना शांत है

क्यों चुप चुप सा रहता है?


क्या राज है इस खामोशी का 

जो तू अपने अंदर रखता है

क्यों चुप्पी का ये रंग सदा 

तेरे चेहरे पर उभरता है?


हर वक्त देखा हैं मैने

तू कागज से बतियाता है

इतना खामोश रहकर भी 

काफी कुछ कह जाता है!


मैने कहा तू समझा ही नहीं

इस खामोशी में शौर भी हैं

तूने गौर से देखा ही कहा 

इस सन्नाटे में कुछ और भी हैं!


मैं और मेरी ये खामोशी 

कुछ ऐसे पेश आते हैं

दिल ये अल्फाज सभी 

कागज से बतियाते हैं!


जब बाते दिल छू जाती हैं

कलम मेरी जबां बन जाती है

दिल के ये अल्फाज सभी 

कागज पर कुर्बान हो जाते हैं!

                      

                    


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract