ज़माना और इश्क़
ज़माना और इश्क़
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दिल में कुछ आस लिए निकला था
सिखाने मैं इश्क़ ज़माने को
नज़ारा कुछ ऐसा देखा है
तरस गया हूँ मुस्कुराने को।
इंसां इंसां से जलता है यहाँ
खुशियाँ हज़म होती नहीं क्यों
अरे अब तो बरसों लग जाते हैं यहाँ
महज़ अपनों को समझ पाने को।
