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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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मै और रिश्ते

मै और रिश्ते

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रिश्ते कुछ खास होते हैं

शायद उनकी डोर उस प्रभु के पास होती है

जो वहां है जहां थोड़ी सी हवा है,थोड़ा सा आसमान है

अक्सर राह चलते कुछ रिश्ते हमें पकड़ कर ले जाते हैं वहां

जहां हम कभी नहीं गये होते

हम चीखते हैं कि नहीं जाना चाहते इस जहां को छोड़ कर

मगर एक हवशी ला पटकता है नए दरख्तों के तले

चिल्लप-पों के बीच अपनी ही आवाज लौट कर

दे जाती है दस्तक

आखिर क्यों हमें आज हर रिश्ते से डर लगता है?

रिश्ते तो रुई के फाहे है

फिर क्यों हम उन्हें नासूर समझ कर ठुकरा देते हैं?

शायद यह समय ही ऐसा है कि-

'हमें अपनी ही परछाईं से डर लगता है'

बदहवास से हम घूमते हैं नंगे पांव

शीशे की दीवारों में अपना माथा लटकाए

हम टहलते हैं सिर्फ अपने पुरवे की ओर

अजीब सी खलल मथ डालती है

और उसकी तपिश में हम सोचते हैं-

काश! कोई अपना भी होता।


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